शेयर (स्टॉक) की
कीमतों को प्रभावित करनेवाले कारण (कारक)
शेयर बाजारमे शेयर की
कीमतों को प्रभावित करनेवाले कारण को एक के बाद एक समजाता हु |
१. माँग और आपूर्ति
(डिमांड एवं सप्लाय)
दिन के अंतराल के दौरान शेयरों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का बड़ा
कारण माँग तथा आपूर्ति होती है। जब कभी विदेशी संस्थागत निवेशक (फॉरेन
इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स - F.I.I. ) शेयर बाजार में
शेयरों को बड़ी खरीदारी करते हैं, इस वजह से उन शेयरों की
माँग बढ़ जाती है तथा बाजार में उन शेयरों की उपलब्धता भी कम हो जाती है, तब उन शेयरों की
कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी देखने को मिलती
है। इससे विपरीत, जब संस्थागत
निवेशकों द्वारा किन्हीं शेयरों की भारी बिकवाली की जाती है तो बाजार में ऐसे
शेयरों को अत्याधिक उपलब्धता उन शेयरों के खरीदारों की माँग से अधिक हो जाती है।
परिणामस्वरूप शेयरों की कीमतों में तुरंत गिरावट आ जाती है।
कई बार किसी इक्विटी का
बड़ा हिस्सा कंपनी के प्रमोटर्स के पास होता है। ऐसी स्थिति में जब कभी ऐसी कंपनी
के शेयरों की माँग बाजार में बढे तो इन शेयरों की कीमतों में तेजी से वृद्धि होती
है, क्योंकि
खरीद-फरोख्त के लिए शेयरों का बड़ा हिस्सा बाजार में उपलब्ध नहीं होता। इसी प्रकार, जब किसी कंपनी का
पब्लिक इश्यू आता है तो उससे कंपनी के शेयरों की कीमत में उतार आ जाता है क्योंकि
नए पब्लिक इश्यू के कारण बाजार में उपलब्ध शेयरों की संख्या में वृद्धि हो जाती है
अर्थात् आपूर्ति बढ़ जाती है।
संस्थागत रुचि
(इंस्टीट्यूशनल इंटरेस्ट)
शेयरों की कीमतों में
छोटे अंतराल के दौरान होनेवाले उतार-चढ़ाव का एक कारण उन शेयरों में संस्थागत
निवेशकों की रुचि भी है। कई निवेशक बाजार के बड़े खिलाडियों की गतिविधियों के
अनुसार निवेश की रणनीति तैयार करते हैं। प्रारंभिक तौर पर यह माना जाता है कि
संस्थागत निवेशकों द्वारा शेयरों की खरीद अथवा बिक्री के पीछे कोई अध्ययन होता है
तथा कुछ निवेशक इस ट्रेंड का अनुसरण करते हैं। यदि फंडामेंटल विश्लेषक इस प्रभाव
को कम समय के निवेश के लिए ही उचित मानते हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा
खरीद-बिक्री कई बार उल्टी भी हो सकती है तथा इसके अनुसार अपनी रणनीति अपनानेवाले
निवेशकों द्वारा दुःखदायी परिणाम भी आते हैं।
कुल स्थिति (ऑल
कंडीशन)
बाजार की 'ओवर ऑल' स्थिति भी शेयरों
की कीमतों को प्रभावित करती है। दो मुख्य कारक ऐसे हैं, जो शेयरों की
कीमतों को प्रभावित करते हैं। पहला है, कंपनी का व्यक्तिगत कारक और दूसरा है ओवर ऑल मार्केट
कंडीशन.
जब बाजार में गिरावट का
दौर चलता है तो अच्छी कंपनियों के शेयर की कीमतों में भी गिरावट देखी जाती है। भले
ही इन कंपनियों से संबंधित कोई बुरी सूचना-समाचार वित्तीय बाजार में न हो। इसी
प्रकार, बाजार में
तेजीवाले दौर में औसत कंपनियों के शेयरों में भी अच्छी वृद्धि देखी गई है, भले ही ऐसी
कंपनियों के शेयरों की कीमतों में वृद्धि का कोई कारण न हो। इसलिए समझदार निवेशक
को शेयरों की कीमतों में आए बदलाव के विश्लेषण में बहोत सावधानी बरतनी चाहिए।
कंपनी से जुड़े कारण में कंपनी
का प्रदर्शन, अधिग्रहण, प्रस्तावित विस्तार तथा विलय (एक्वीजिशन एंड डिमर्जर) एसे
भी है |
कंपनी का प्रदर्शन
(परफॉरमेंस ऑफ कंपनी)
कंपनी का वित्तीय तथा
गैर-वित्तीय प्रदर्शन उस कंपनी के शेयरों की कीमतों में उस कंपनी के शेयरों द्वारा
अच्छे रिटर्न तथा डिवीडेंड की आशा में रुचि पैदा होती है। प्रभावित करता है। यदि
कोई कंपनी वित्तीय रूप से अच्छा प्रदर्शन करती है तो निवेशको परिणामस्वरूप शेयरों
की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज होती है। इसी प्रकार जब कंपनी के इतर-वित्तीय प्रदर्शन
जैसे कंपनी द्वारा कुल बिक्री, वसूली (रियलाइजेशन), कंपनी द्वारा अर्जित अन्य आय इत्यादि, अच्छा हो तो यह
निष्कर्ष निकालकर कि कंपनी को आधारभूत स्थिति मजबूत है, उस कंपनी के
शेयरों में कुछ वृद्धि दर्ज होती है।
अधिग्रहण तथा
विलय (एक्वीजिशन एंड डिमर्जर)
एक कंपनी द्वारा दूसरी कंपनी का अधिग्रहण या विलय किए जाने पर दोनों कंपनियों की वित्तीय तथा गैर-वित्तीय स्थितियों में परिवर्तन आता है। इसी का आकलन वित्तीय बाजार में किया जाता है तथा इसके अनुसार कंपनियों के शेयरों की कीमतों में परिवर्तन आ जाता है। आजकल बहुत सी कंपनियाँ तो देश शे बाहर जाकर भी अधिग्रहण करती हैं। इस प्रकार का अधिग्रहण इन कंपनियों के भावी प्रदर्शन में प्रभावकारी होता है। इससे इन कंपनियों के शेयरों की कीमतों में परिवर्तन आता है। इसी प्रकार, किसी कंपनी का विलय उस कंपनी की वित्तीय तथा अन्य स्थितियों में परिवर्तन लाता है। विलय से बाजार में कंपनी के मार्जिन एवं वैल्यूएशन में परिवर्तन आता है तथा उससे कंपनी के शेयरों की कीमतें प्रभावित होती हैं।
प्रस्तावित
विस्तार (एक्सपान्शन)
किसी कंपनी द्वारा अपनी
क्षमता बढ़ाने अथवा नई गतिविधियाँ शुरू करने के लिहाज से प्रस्तावित विस्तार योजना
को बाजार में बारीकी से देखा जाता है। ऐसी स्थिति में बाजार के विश्लेषक यह आकलन
करते हैं कि कितने समय पश्चात् ये विस्तारित योजनाएँ लाभ देने लगेंगी। कंपनी की
भविष्य में होनेवाले विकास के मद्देनजर निवेशको की इस कंपनी के शेयरों में रुचि
बढ़ती है तथा परिणामस्वरूप शेयरों की कीमतों में वृद्धि भी दर्ज होती है।
उद्योग के विकास की
स्थिति (स्टेज ऑफ ग्रोथ )
प्रत्येक कंपनी
किसी-न-किसी प्रकार के इंडस्ट्री सेक्टर से जुड़ी होती है तथा वह नति रंत को
कंपनी इन सेक्टरों के ट्रेंड से प्रभावित हुए बिना नहीं रह
सकती। उदाहरण के लिए, जब इन्फॉर्मेशन
टेक्नोलोजी इंडस्ट्री में मंदी का दौर (विभिन्न कारणों से) चल रहा हो तो इस
क्षेत्र से जुड़ी कोई विशेष इन्फॉर्मेशन टेक्नोलोजी कंपनी आधारभूत रूप से कितनी भी
मजबूत हो, इस कंपनी के
शेयरों पर भी इंडस्ट्री की मंदी का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। किसी इंडस्ट्री के
विकास के विभिन्न चरण होते हैं तथा इस प्रकार की इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों के
शेयर की कीमतों पर इन चरणों का प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे कोई एक कंपनी ऐसी
इंडस्ट्री से जुड़ी है, जो अपने विकास के
प्रारंभिक चरण में है- अर्थात् उस इंडस्ट्री के विकास में काफी संभावनाएँ हैं। इस
प्रकार इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों के शेयरों को भी इसी संभावना से जोड़कर देखा
जाता है। इसके विपरीत, कोई अन्य कंपनी
एक ऐसी इंडस्ट्री से जुड़ी है, जो अपने विकास के अंतिम चरण में है, अर्थात् उस
इंडस्ट्री में भावी संभावनाएँ काफी कम हैं तो ऐसी इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों के
शेयरों की कीमतें भी इस स्थिति से प्रभावित होंगी।
वसूली
(रियलाइजेशन)
किसी इंडस्ट्री या कंपनी
में अपने व्यापार से जुड़ी वसूली की स्थिति काफी महत्त्वपूर्ण होती है। यदि किसी
इंडस्ट्री की कंपनियों में अच्छे मार्जिन के साथ बिना किसी परेशानी के पूरी वसूली
हो रही हो तो ऐसी स्थिति में कैश फ्लो जैसी समस्याएँ नहीं होतीं तथा ऐसी इंडस्ट्री
से जुड़ी कंपनियों के शेयरों की कीमतें प्रभावित नहीं होती हैं। इसके विपरीत, यदि कंपनी ऐसे
व्यापार से जुड़ी है, जहाँ वसूली
अपेक्षाकृत आसान न हो तो इसका प्रभाव कंपनी के व्यापार तथा कंपनी के शेयरों की
कीमतों पर भी पड़ता है। माँग तथा आपूर्ति की स्थिति भी वसूली को प्रभावित करती है।
अतः ऐसी स्थिति में उस इंडस्ट्री से जुड़ी माँग व आपूर्ति पर भी निवेशक को नजर
रखनी चाहिए।
हरिफाई (कॉम्पीटिशन)
किसी कंपनी को उसकी
इंडस्ट्री के अंदर से अन्य कंपनी से अथवा इंडस्ट्री के बाहर की अन्य कंपनी से जिस
प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, उससे भी उस विश्लेषण इस दृष्टिकोण से किया जाता है कि इससे
कंपनी का प्रदर्शन किस प्रका प्रभावित हो सकता है या इस प्रतिस्पर्धा के चलते
कंपनी में क्या बदलाव लाया जा सक कंप के शेयरों की कीमतें प्रभावित होती हैं।
कंपनी को मिलनेवाली प्रतिस्पर्धा है। इस प्रतिस्पर्धा से उस कंपनी की योजना प्रभावित
हो सकती है तथा इसका प्रभाव कंपनी के शेयरों की कीमतों पर भी हो सकता है।
वैश्विक कारक
(ग्लोबल फैक्टर्स)
आजकल अधिकतर कंपनियाँ
तेजी से वैश्विक (ग्लोबल) होती जा रही है। अतः वैश्विक घटनाओं का इन कंपनियों की
कार्यशैली पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
चूंकि ग्लोबल स्तर पर
घटनाक्रम तेजी से बदलता है तथा जो कंपनियों इस प्रकार के घटनाक्रम से शीघ्र
प्रभावित हो सकती हैं, उन कंपनियों में
निवेश विचारणीय विषय होता है। उदाहरणार्थ, कॉमोडिटी इंडस्ट्री से संबंधित किसी कंपनी की कार्यशैली
वैश्विक स्तर पर कॉमोडिटी की कीमतों में आए परिवर्तन से अवश्य प्रभावित होगी।
विश्व के किसी भी हिस्से में किसी कॉमोडिटी की माँग/आपूर्ति में आया परिवर्तन, स्थानीय प्रभाव
भी अवश्य डालेगा। उदाहरण के लिए - वर्ष 2007 में अमेरिका की अर्थव्यवस्था में आई मंदी के चलते आई.टी.
कंपनियों का व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके चलते भारत में मजबूत आधारभूत
संरचना आई.टी. कंपनियाँ जैसे इंफोसिस, विप्रो तथा टी.सी.एस. के शेवरों की कीमतों में भी गिरावट
देखी गई; क्योंकि भारत का
लगभग 65 प्रतिशत आई.टी.
बिजनेस ग्लोबल स्तर पर है। इस प्रकार की ग्लोबल संभावनाएँ अनगिनत होती हैं तथा
निवेशकों को यह समझना आवश्यक है कि ये कारक किन स्थितियों में, किस प्रकार तथा
कब परिवर्तन ला सकते हैं।
स्थानीय सरकारी नियमन
(लोकल रेग्यूलेशन)
कंपनियों को स्थानीय
सरकार द्वारा लागू किए गए कानून तथा नियमों का पालन करना पड़ता है। नए लागू
होनेवाले नियम भी किसी कंपनी के भावी विकास को प्रभावित कर सकते हैं अथवा कुछ नियम
किसी कंपनी के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं। कुछ नियमों के पालन में कंपनी को
अत्यधिक खर्च करना पड़ सकता है, जो उस कंपनी के मूल्यांकन में तथा फिर इस कंपनी के शेयरों
की कीमत में भी प्रभावी हो सकता है।
टेक्स का असर
कंपनियों द्वारा उपयोग
में लाए जानेवाले कच्चे माल तथा कंपनियों द्वारा उत्पादित माल पर सरकार कई प्रकार
के टैक्स लगाती है। सरकार अपनी उद्योग-नीति के अनुसार किसी इंडस्ट्री को करों में
छूट देती है तथा कभी इंडस्ट्री पर नए कर भी लागू करती है। ऐसा भी होता है कि किसी
इंडस्ट्री पर देश के किसी एक हिस्से में करों में छूट मिलती है। ये सभी
परिस्थितियाँ कंपनियों के व्यापार एवं उनकी भावी ग्रोथ को प्रभावित करती हैं तथा
इससे इन कंपनियों के शेयरों की कीमत भी प्रभावित होती है।
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